5+ Great Inspirational Story In Hindi you will inspire

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6 Best Must Read Inspirational Story In Hindi

सब्र का महत्व

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यह कहानी बहुत ही पुरानी है, उस समय महात्मा गौतम बुद्ध पूरे भारतवर्ष में घूम घूम कर बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार कर रहे थे। धर्म प्रचार के सिलसिले में बे कुछ अपने शिष्यों के साथ एक गांव में घूम रहे थे। काफी देर तक भ्रमण करते रहने से उन्हें बहुत प्यास लगी थी। प्यास बढ़ता देख उन्होंने एक शिष्य को पास के गांव से पानी लाने काहा।

जब वह शिष्य पास के गांव में पहुंचा, तो उसने देखा कि वहां एक छोटी सी नदी बह रही है। लेकिन उसके पानी में काफी सारे लोग कपड़े धो रहे हैं, खुद भी नहा रहे हैं और कई अपने गायों को भी नहला रहे थे। और इसी के कारण नदी का पानी काफी गंदा हो चुका था।

शिष्य को नदी के पानी का यह हाल देख कर लगा, के गुरुजी के लिए यह गंदा पानी ले जाना उचित नहीं होगा। इसी तरह वह बिना पानी के वापस आ गया। लेकिन इधर गुरु जी को पेयास से गला सूख रहा था। इसीलिए उन्होंने फिर से पानी लाने के लिए दूसरे शिष्य को भेजा।

लेकिन इस बार वह शिष्य मटके में पानी भर के लाया। यह देख कर महात्मा बुद्ध थोड़ा आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने शिष्य को पूछा, “गांव के बहने वाले नदी के पानी तो गंदा था, फिर यह पानी कहां से लाए?”

शिष्य बोला, “हां गुरुजी उस नदी के पानी सच में बहुत गंदा था, परंतु जब सब ने अपना काम खत्म करके चले गए, तब मैं कुछ देर वहां ठहर कर पानी में मिली मिट्टी के नदी के तल में बैठने का इंतजार किया। जब मिट्टी नीचे बैठ गई, तो पानी साफ हो गया। और वही पानी मैं आपके लिए लाया हूं।”

महात्मा बुद्ध उस शिष्य का उत्तर सुनकर बहुत ही खुश हुए। और दूसरे शिष्य को शिक्षा दी, “हमारा जीवन भी नदी के पानी की तरह है, जीवन में अच्छे कर्म करते रहने से यह हमेशा शुद्ध बना रहता है। परंतु अनेक बार जीवन में ऐसे भी समय आता है, जब हमारा जीवन दुख और समस्या से गिर जाता है। ऐसी अवस्था में जीवन समान या पानी भी, गंदा लगने लगता है।”

बिशेषणाओ से सीख

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एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी लाने गया, फिर वह वहां पर एक लोमड़ी को देखा, जिसके दो पैर नहीं थे, फिर भी वह बहुत खुश लग रही थी। वह कैसे भी करके बहुत कठिनाई से एक स्थान से दूसरे स्थान में जाती थी। लोमड़ी को देख के किसान को दया आ रहा था।

किसान सोच रहा था, ‘यह जंगल में जीवित कैसे है? यह कहीं जाकर शिकार भी नहीं कर सकती। और बड़े जानवर से अब तक सुरक्षित जीवित कैसे हैं?’ तभी उसने देखा एक शेर मुंह में एक शिकार दबा के उसी तरह आ रहा है। और सभी जानवर भागने लगे। और वह किसान भी जल्दी पेड़ में चर गया।

लेकिन लोमड़ी भाग नहीं पा रही थी, और वह वहीं पर खड़ी थी। उसने देखा की शेर उस लोमड़ी के पास आया, उसे अपना भोजन बनाने की जगह, प्यार से अपने सीकर का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया। शेर के वापस चले जाने पर, किसान उस पेड़ से उत्तरा, और ज्यादा शाम होने की वजह से, वह घर लौट आया। और रात भर इस घटना को सोचने लगा।

फिर से अगले दिन सुबह किसान वहीं पर लकड़िया लेने गया। दूसरे दिन भी उसने देखा, के शेर फिर से आया और प्यार से लोमड़ी को अपने शिकार का थोड़ा हिस्सा देकर चले गए। किसान ने इस अद्भुत लीला के लिए ऊपर वाले को धन्यवाद किया। उसे एहसास हो गया, की ऊपरवाला जिसको पैदा करते हैं, उसके रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं।

यह सब देखने के बाद वह एक जंगल में चला गया, और एक जगह जाकर बैठ गया। उसने सोचा ऊपरवाला जिसे पैदा करते हैं, उसके रोटी का इंतजाम कर देते हैं। वह मेरे लिए कोई ना कोई इंतजाम तो कर ही देंगे। कहीं दिन गुजरने के बाद भी कोई नहीं आया। अब वह भूख से बहुत कमजोर हो चुका था, अब अगर उसे खाना नहीं मिलता, तो उसकी जान निकल जाती।

आखिरकार वह आपने घर वापस आने को सोचा। तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन कराया और पीने के लिए पानी दिया। वह किसान उस विद्वान व्यक्ति के चरणों में गिरकर बहुत-बहुत धन्यवाद किए। और फिर लोमड़ी की बात बताते हुए कहा, “महाराज भगवान ने उस अपाहिज लोमड़ी पर दया दिखाइ, पर मैं तो मरते मरते बचा। भगवान ने मेरे ऊपर दया क्यों नहीं दिखाई?”

महात्मा उस किसान के सर पर  हाथ फिराया और मुस्कुरा के कहा, “तुम इतने नासमझ हो गए की तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा। इसलिए तुम्हें इस तरह के मुसीबत का सामना करना पड़ा, और तुम आज मरते मरते बच गए। तुम यह क्यों नहीं समझते कि भगवान तुम्हें उस शेर की तरह मदद करने वाला बनता देखना चाहते थे, उस लाचार लोमड़ी की तरह नहीं।”

फिर उस किसान को महात्मा के सारी बात समझ में आ गई। उसे पता चल गया कि, हमें चीजें जिस तरह समझना चाहिए हम उस तरह समझते नहीं। ईश्वर ने हम सबके अंदर कुछ ऐसे शक्तियां दी है, जो हमें महान बना सकती है। चुनाव हमें करनी है, कि हमें शेर बनी है या लोमड़ी।

अब्राहम लिंकन

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यह कहानी उस बालक की है जो एक बहुत ही गरीब परिवार से संबंध रखता था। बालक के पिता खेती का काम करते थे। बड़ा बेटा होने के कारण परिवार के कार्यों में वह मदद किया करता था। उनके पिता बहुत ही गरीब थे, दो वक्त के खाना भी ठीक तरह से नहीं जुटा पाते थे।

जो कुछ भी रुखा सुखा मिलता था उसी को खा कर संतोष कर लेते थे। पूरा परिवार बड़ी कठिनाई से जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन ऐसा वक्त आया जब घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था। एक दिन बीता, दो दिन बीते छोटे भाई बहन के दशा उसे देखी नहीं गए।

घर में वह बालक सबसे बड़ा था, इसलिए जिम्मेदारी भी समझता था। कुछ दिन बालक सोचता रहा कि क्या करें, फिर कुछ उत्साह के साथ उठा और मछली पकड़ने का कांटा लेकर नदी के और चल दिया।

सूरज बहुत तेजी से चमक रहा था, हवाई चल रही थी। बालक नदी के किनारे बैठ कर मछली पकड़ने के लिए प्रयास कर रहा था। भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि कुछ ज्यादा मछलियां फंसे की घर वालों का पेट भर सके।

सारा दिन कोशिश करने के बाद वह बालक बहुत निराश हो गया, ताकि कांटे में एक मछली फांसी। वह मछली लेकर घर के और चला, और वह यह सोचा छोटे भाई बहन को कुछ तो मिलेगा। रास्ते में उसके मुलाकात एक सैनिक से हुई, सैनिक ने बालक के पास आकर कहा, “यह मछली तो बहुत अच्छी है।” बालक ने जवाब दिया, “यह तो खाने पर ही पता चलेगा।”

सैनिक ने कहा, “क्या खुद ही पकड़ कर लाए हो?” बालक ने कहा, “जी हां श्रीमान।’ सैनिक ने कहा, “मुझे मछली खाए लंबे समय हो गए है, मैं पिछले कुछ वर्षों से लड़ाई के मैदान में हूं। बहुत समय से अच्छा भोजन नहीं खाया, क्या तुम वह मछली मुझे उपहार में दे दोगे?”

बालक की मन में उलझन बनी रही। एक और जहां भाई बहन खाने की रहा देख रहे होंगे, एक तरफ देश के रक्षा करने वाला सैनिक। यह सैनिक देश के लिए अपनी नींद, घर, परिवार, सुख त्याग कर देते हैं।

बालक ने अपने मन को समझा लिया, और भाई बहनों से सैनिक का पल्ला ज्यादा भारी देखा। ऐसा विचार करके उसने सैनिक को वह मछली दे दी। सैनिक ने धन्यवाद दिया और कहां, “तुम एक दिन जरूर बड़े आदमी बनोगे।” और यह कह कर सैनिक ने वह मछली लेकर चले गए।

उसके जाने के बाद वह बालक उदास हो गया क्योंकि भूखे भाई बहन के चेहरा याद आ गया था। वह तेजी से घर की ओर बढ़ा, सूरज भी ढल चुका था, अंधेरा होने लगा था। वह बालक खाली हाथ घर आया, मां का मन दुख से भर गया।

मां ने उदास मन से पूछा, “क्या एक भी मछली नहीं मिली?” बालक ने कहा, “मिली थी मां” ओर फिर उसने सारी बात बता कर कहा। बालक ने पूछा, “क्या मैं कुछ गलत किया मां?” उसके मां ने कहा, “नहीं बेटा, तुम कुछ भी गलत नहीं किए। तुमने सैनिक को मछली देखकर यह विश्वास दिया है, के जिस देश के लोग अपने सैनिकों को जितना प्यार देंगे, उनके हंस ले उतने ही बुलंद होंगे। मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं, तुम एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे।” और यह बालक आगे चलकर अब्राहम लिंकन नाम से प्रसिद्ध हुआ। और अमेरिका के राष्ट्रपति बना।

मौत की दर्शन 

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चोरों के एक झुंड ने जंगल में रहने वाले एक महात्मा से पूछा, “हम लोग मौत के दर्शन करना चाहते हैं। आपने देखी हो तो बता दे!” महात्मा ने एक गुफा की ओर इशारा किया और कहा, “मौत उस गुफा में रहती है, तुम जाओ तो मिल जाएगी।”

चोरों ने वहां गए, जाकर देखा के गुफा में सोना भरा पड़ा है। वह मौत की बात तो भूल गए, और सोने को घर ले जाने की योजना बनाने लगे। तेर हुआ की सोने को रात की समय घर ले चलना चाहिए। दिन में खा पीकर आराम कर लेना ठीक होगा।

एक चोर बाजार में खाना लेने के लिए गया। और दूसरा शराब लेने के लिए। बाकी दो चोर वहां सोने का सुरक्षा के लिए रुक गया। दोनों अलग अलग हुए और खाली समय में यह योजना बनाने लगे, बाकी सब को मार कर बाकी सोना वह अकेला ही हड़प ले।

जो चोर गुफा में पहरेदारी के लिए बैठे थे, उसने सोने के टुकड़े से दो हथियार बनाएं। इतनी ही देर में पहला चोर खाना लेकर आया, तो उसके पेट में छोरी भोग दी। और उसके लाश पत्थरों के नीचे दबा दिया। दूसरा चोर शराब लेकर आया, तो उसका भी यही हाल किया। इस प्रकार दो चोर मर गए।

आप बैठी हुई दो चोरों ने खाना खाकर चलने की तैयारी की। जो चोर मर गए थे वह खाने में और शराब में पहले ही जहर मिलाकर लाए थे। इनका इरादा भी जहरीला शराब और जहरीला खाना खिलाकर सबको मार देने का था। बचे हुए दो चोरों ने खाना खाया खाना खाया और शराब पी। और थोड़ी देर में यह दोनों भी मर गए।

इस कहानी में महात्मा ने सच ही कहा था, के मौत गुफा में रहती है। और यह मात्र गुफा में ही नहीं, हमारे मनुष्य की घर में भी रहती है। आज छोटे से लोग के कारण, हां हम वापस में मरने मिटने के लिए तैयार हो जाते हैं। एक दूसरे को या पूरे परिवार को मरने के लिए तैयार हो जाते हैं।

छोटी सी संपत्ति के कारण, भाई भाई में लड़ाई, मारामारी हो जाती है। जबकि यह परम सत्य है की, जिसके लिए हम मर मिटने के लिए तैयार हो जाते हैं, वह सभी यही छोड़कर जाना है हमें। फिर इसे क्या मतलब है कि हम बहुत सारे पैसे छोड़ गए, या बहुत सारे संपत्ति।

समझदार मेंढक

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एक बार कुछ मेंढक एक गहरे और सूखे कुएं में गिर गए। उनमें से हर एक ने उस कुए से बाहर निकलने के बहुत कोशिश किए, पर वह बाहर नहीं निकल पाए। जब भी कोई मेंढक ऊपर चढ़ने लगता, तो बाकी सब मेंढक नीचे से जोर-जोर से चिल्लाने लगते।

वह सब उसको चिल्ला के कहते थे, “आरे यह तुम क्या कर रहे हो? क्यों मरना चाहते हो? कुएं से बाहर निकालना ना मुमकिन है। तुम कभी बाहर नहीं निकल पाओगे, कुए की दीवार बहुत ऊंची और फिसलन भरी है। अगर तुम थोड़ा ऊपर चर ही जाओगे, तो नीचे गिर कर मर जाओगे। नीचे आ जाओ, ऊपर मत चारों।”

यह सब बेकार और नकारक बातें सुनकर ऊपर चढ़ने वाला हर कोई मेंढक हिम्मत हार जाता, और नीचे गिर जाता। फिर सारे मेंढक ऊपर चलना ही छोड़ दिया, और फिर वह सब उसी कुएं में रहने लगे। और वही उनकी दुनिया बन गई।

समय गुजरता गया, मेंढक में कई मेंढक पैदा हुआ। उनमें से एक मेंढक ने बाहर जाने के बारे में पूछा, तो बाकी मेंढक होने असफलता की ढेर सारी कहानी सुना दी। और कहा की, “यह नामुमकिन है, कुवैत से बाहर नहीं निकाल जा सकता।’

परंतु इस नई जवान मेंढक को कुएं की अंधेरे और सीमित जिंदगी से नफरत होने लगी थी। इसलिए उसने ठान लिया कि मैं इस कुएं से बाहर निकल के ही दम लूंगा। और मैं अंधेरे में नहीं रह सकता। कुए की बाहर की रंगीन दुनिया, खुली हवा और पानी के बड़े तालाब में रहने की इच्छा ने, कुए की बाहर निकलने की भूख उसे और बढ़ा दी थी।

आखिर में वह एक दिन फैसला किया, और वह ऊपर चढ़ने लगा। उसे ऊपर चढ़ता देख बाकी सारे मेंढक नीचे से जोर-जोर से चिल्लाने लगे, “यह पागल नीचे उतर जा तू, तू बेवकूफ है जो इस काम को पूरा करने चला है। जॉब बरे बरे ताकतवर मेंढक इस दीवार को नहीं चर पाए, तो तू क्या चरेगा? लगता है तेरा अंतिम समय आ गया हैं। ऊपर से गिरकर तेरी मौत होगी।”

लेकिन उस मेंढक ने कुए के दीवार का अध्ययन किया था, और ऊपर चढ़ने का अभ्यास भी किया था, इसी के बदौलत वह ऊपर चढ़ता गया, और आखिरकार वह ऊपर पहुंचने में कामयाब हो ही गया। उसने यह नामुमकिन काम करके दिखाया था। ऊपर पहुंच कर वह बहुत खुश हुआ, और खुद को शाबाशी देने लगा।

क्योंकि वह बाकी उन सारे मेंढक की नासूचक और निराशाजनक बातों पर ध्यान नहीं दिए, लगातार ऊपर चढ़ता गया। अगर वह जरा भी उनकी बातों पर ध्यान देता, तो वह यह नामुमकिन काम को सायेद मुमकिन करके नहीं दिखा पाता था।

ऊनी सारे मेंढक की तरह हमें भी जिंदगी में सैकड़ों ऐसी अनहोनी सोच वाले लोग मिलते हैं, जो हमें गलतफहमी में ले जाते हैं। वह कहते हैं, “की यह काम बहुत मुश्किल है, यह कभी नहीं हो सकता। वह नहीं कर पाया तो तू कैसे कर पाएगा?” तो क्या यह सब ना सूचक बातें सुनकर हमें रुक जाना चाहिए? नहीं कभी नहीं।

उसी मेंढक की तरह हम भी आसपास के नामुमकिन और कमजोर सोच वाले लोगों को पर कोई ध्यान ना देकर अपनी लक्ष्य की ओर लगातार मेहनत से बढ़ते रहे, तो कोई भी चीज हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकते। और फिर एक दिन, उस मेंढक की तरह हम भी अपने लक्ष्य को पा लेंगे। और आपने आपको शाबाशी दे रहे होंगे। तो बढ़ते चले अपने लक्ष्य की ओर, बिना थके, बिना रुके।

चिड़िया का घोंसला

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सर्दियां आने को थी, और एक चिक्की चिड़िया का घोंसला पुराना हो चुका था। उसने सोचा, चलो एक घोंसला बनाते हैं, ताकि ठंड के दिनों में कोई परेशानी ना हो। अगले सुबह वह उठी, और पास के एक खेत से चुन-चुन के तिनका लाने लगे। सुबह से शाम तक वह इसी काम से लगी रहती। और आखिरकार एक सुंदर घोंसला तैयार कर लिया।

और पुराने घोसले से अत्याधिक लगाव होने के कारण, उसने सोचा चलो आज आखरी बार उस घोसले में सो लेते हैं। और कल से अपने नए घोंसले में आशियाना मनाएंगे। रात में चिक्की चिड़िया वही पुराने घोसले में सो गई। अगले दिन सुबह होते पर वह अपने नया घोसले की और उड़ी।

पर जैसे ही वह वहां पहुंची, उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। किसी और चिड़िया ने उस का घोंसला तहस-नहस कर दिया था। चिक्की की आंखें भर आई, वह मायूस हो गई। आखिर वह बहुत मेहनत और लगन से अपना घोंसला बनाया था। और किसी ने रातों-रात उसे तबाह कर दिया।

और अगले ही पल कुछ अजीब हुआ, उसने गहरी सांस ली हल्का सा मुस्कुराई और एक बार फिर उस खेत में जाकर तिनके चुनने लगी। उस दिन की तरह उसने आज भी सुबह से शाम तक मेहनत की, और एक बार फिर उससे बेहतर और नया घोंसला तैयार कर लिया।

तो इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है, जब हमारे मेहनत का पानी फिर जाता है, तो हम कितनी शिकायत करते हैं, रोते हैं, लोगों पर गुस्सा दिखाते हैं। लेकिन हम एक काम नहीं करते, उस बिगड़े हुए काम को दोबारा सही करने की कोशिश नहीं करते। और चिक्की चिड़िया के यही कहानी हमें बस यही करने की सीख देती है।

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