5+ Great Panchatantra In Hindi Story you will love (2020)

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6 Great Panchatantra In Hindi Story for kids

चूहों की सभा 

PanchaTantra-In-Hindi-Story

एक बहुत बड़े मकान में, सेंकरो चूहे रहते थे। उन सब की जिंदगी हंसते, खेलते, फुदकते, बड़े आनंद से गुजर रही थी। परंतु एक दिन अचानक घर का मालिक, एक बिल्ली उठा लाया।

बिल्ली क्या आई चूहों की तो जैसे शामत आ गई है। बिल्ली बहुत डरावनी थी, उसे ढेर सारे दूध पीने को मिलता था। परंतु फिर भी उसकी संतुष्टि नहीं हो रही थी।वह घंटों लेटी रहती, तीन चार चूहे तो वह रोज पकड़कर खा जाती।

समस्या दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही थी। थक हार कर चूहों ने सभा बुलाई, जिसमें हर छोटा बड़ा चूहा हाजिर हुआ। एक बोला, “हमें इस मुसीबत से छुटकारा पाना ही होगा, भाइयों अपने अपने सुझाव दो, के बिल्ली को कैसे मारा जाए। या कैसे उसे पीछा छुड़ाया जाए।”

बहुत समय तक खुसुर फूसुर होती रही। काफी देर बाद एक नन्हा चूहा आगे बढ़ा और बोला, “क्यों ना बिल्ली के गले में घंटी बांध दे। जहां कहीं भी वह जाएगी, घंटी की आवाज आ जाएगी। और हम अपने अपने बिल में शुभ जाएंगे। तो बिल्ली हमारा कुछ भी नहीं बिगड़ पाएगी।”

चारों ओर तालियां बजने लगी। सभी बोलने लगी,  वाह वाह यह तो सचमुच वारा अद्भुत उपाय था। इस नन्हे विचार तो सचमुच कमाल का है। लगता है आब हमारे फिर सुहावने दीन लौटने वाले हैं। आब हमें किसी तरह का भय खाने की जरूरत नहीं। आराम से चैन की बांसुरी बाजाएंगे।

सदा के लिए मुसीबत से छुटकारा, इस नन्हे ने तो हमारी चिंता का सदा के लिए अंत कर दिया। इसे सम्मान मिलना चाहिए। एक बड़ा चूहा जो चुपचाप एक कोने में बैठा हुआ था, वह बोल उठा, “सुनो जरा मेरी भी सुनो, तुम सब एक बात भूल रहे हो।”

उसमें से एक चूहे ने पूछा, “क्या है वह?” तभी उस बूढ़े चूहे ने कहा, “एक बात तो बताओ, बिल्ली के गले में घंटे बांधेगा कौन?” और फिर यह बात सुनकर सबके होश उड़ गए।

कौन मौत के मुंह में जाए, किसी में भी इस काम को पूरा करने का पीड़ा उठाने की हिम्मत नहीं थी। ऐसा खतरनाक काम कौन पसंद करता। सभी एक दूसरे का मुंह ताकते रह गए।

अचानक बिल्ली की आवाज आई, सभी अपनी अपनी जान बचाने के लिए अपने अपने बिलो में घुस गए। और यह बात से हमें यह सीख मिलती है, सुझाव देना आसान है, परंतु अमल करना मुश्किल है।

शेर और गधे की दोस्ती

एक शेर और गधे के बीच में गहरी दोस्ती हो गई, दोनों इकट्ठे इधर उधर इधर उधर मंडराते घूमते थे। जहां भी वह जाते बाकी जंगली जानवर में भागदौड़ सी माच जाती थी।

होता तो यह शेर के कारण था, परंतु अपने गधे महाराज को यह लगता था, कि जानवर उससे डरने लगे हैं। वह अपने आप को बाकी जानवर से जादा ताकतवर समझने लगा।

एक बार जो वह इधर-उधर घूमते हुए फिर रहे थे, के उन्हें भेड़ियों की एक झुंड नजर आया। भेड़ियों को देखते ही गधे में जोश आ गया। और वह जोर-जोर से दहाड़ ने की कोशिश करने लगा और भेड़ियों की ओर लपका।

भेड़िए शेर से जान बचाने के लिए भागने लगे, सभी को अपनी जान प्यारी थी। जिसको जिधर रहा मिली, वह उधर ही निकल बड़ा। वह सब देख गधा बहुत खुश हुआ। वह शांत से वापस शेर की ओर आने लगा।

उसे देख कर शेर बोला, “आज क्या हुआ, तुम बहुत जोर से दहाड़ ने की कोशिश कर रहे थे?” गधे ने बोला,

“मित्र तुमने ध्यान नहीं दिया, मुझे देख भेड़ियों में कितना भागदौड़ मच गई थी, वह समझे कि मैं उन्हें खा जाऊंगा।”

यह सुनकर शेर को हंसी आ गई, और बोला, “अच्छा तो तुम इस कारण खुश हो रहे हो? तुम मेरे मित्र हो यह सब जानते हैं, और मैं तुम्हारे साथ था, यह भी एक कारण है। परंतु ध्यान रहे, ऐसी बेवकूफी तभी मत कर बैठना, जब मैं तुम्हारे पासना हूं। नहीं तो भेड़िए तुम्हें चबा कर खा जाएंगे। समझे?”

यह सुनकर गधे ने कहा, “हां मित्र मैं भूल गया था, की दूसरों के बल पर किसी से दुश्मनी नहीं लेना चाहिए। मुझे माफ कर दो, मेरा गलती हो गई।

और उस दिन से गधे ने ऐसी बेवकूफी दोबारा कभी नहीं की। और वह दोबारा कभी शेर के शक्ति का गलत इस्तेमाल कभी नहीं किए। क्योंकि वह समझ गए थे कि जंगल के सारे जानवर सिर्फ़ शेर को देखकर ही डरता है।

चालाक बिल्ली

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एक घने जंगल में था एक बड़ा सा पेड़, उस पेड़ में रहती थी एक चिड़िया। चिड़िया सबकी मदद करती थी, और पेड़ पर रहने वाले पक्षी, सब उसको बहुत पसंद करते थे।

चिड़िया रोज सुबह खाने की खोज में बाहर निकलती थी, और शाम को वापस पैर में आती थी। बाकी के सारी पक्षी अभी यही करते थे, और नजर भी रखते थे के चिड़िया वापस आए या नहीं।

एक दिन चिड़िया खाने की खोज में बाहर तो निकली, पर वह घर वापस नहीं लौटे। बाकी के पक्षी सोचने लगे, के चिड़िया वापस आए क्यों नहीं।

इसी दौरान एक दिन वहां पर आया एक खरगोश, जो जंगल में नया नया आया हुआ था। वह रहने के लिए जगह ढूंढ रहा था, जब उसने उस पेड़ को देखा।

खरगोश पेड़ के अंदर बस गया। बाकी के पक्षियों ने खरगोश को रोक के बोला, “यह खरगोश हमारे दोस्त चिड़िया यहां पर रहती है, वह खाने की खोज में गई है, वह अभी तक वापस नहीं आई, बेहतर है कि तुम कोई और जगह ढूंढो।”

खरगोश ने कहा, “अब मैं इधर आ गया, और इस पेड़ में चिड़िया तो है नहीं, तो आब ए मेरा घर हुआ।” बाकी के पक्षी सोचने लगे, कि चिड़िया को वापस लड़ने के बाद, इस खरगोश को तो यहां से निकल नहीं होगा। फिर वह वहां से चले गए।

खरगोश आराम से पेड़ में रहने लगा, और अचानक से एक दिन चिड़िया वापस आ गई। और उसने देखा कि उसके घर में कोई और रह रहा था। ओ खरगोश को देखकर पूछता है, “तुम मेरे घर में क्या कर रहे हो?”

खरगोश ने कहां, “जब मैं इधर आया तो यहां पर कोई नहीं था, तो इसीलिए मैं यहां पर बस गया। अब यह मेरा घर है।” यह सुनकर चिड़िया ने कहा, “मैं तो खाने की खोज में बाहर गई थी, और अब तुमने यहां कब्जा कर लिया? और बोल रहे हो कि यह तुम्हारा घर है?

अगर तुम्हें कोई सबूत चाहिए, तो तुम बाकी के पक्षियों को पूछ सकते हो। कि यह मेरा घर है या नहीं। और फिर तुम्हारी सारी गलतफहमी दूर हो जाएगी।”

और फिर बाकी के पक्षी हो वहां पर आए और बोला कि, उन्होंने तो पहले ही बोला था, के यह चिड़िया की घर है, कृपया यहां से चली जाए। पर खरगोश ने उनकी बात नहीं मानी। और बस बोलने लगा, सारी पक्षियों तो बस चिड़िया के दोस्त है ना, तो वह उसी का साथ देंगे।

खरगोश ने कहा, “तुम्हारी दोस्तों के अलावा हमें कोई और को इसके बारे में बताना चाहिए। ताकि वह इस बात का फैसला कर सके।” बेचारे चिड़िया को लगा कि इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। और खरगोश के बात को मान लिया।

उसी समय खरगोश ने एक बिल्ली को जाते हुए देखा, और उसको बुलाया। बिल्ली ने मनोमान सोची , मैं तो खाने की खोज में निकली थी,और इस खरगोश को मुझे अभी बुलाना था। बिल्ली गई खरगोश के पास।

खरगोश ने बिल्ली को बोला, “हमारी दोस्त बिल्ली, हमें आपकी मदद के आवश्यकता है। कृपया आप इस समस्या को हल कर दें।”

बिल्ली ने खुद से कहा, “मुझे लगा आज मुझे खाने को कुछ नहीं मिलेगा, मगर इस खरगोश ने तो मुझे खुद पास बुलाया है। मुझे इसका फायदा उठाना ही पड़ेगा।”

खरगोश ने कहा, “क्या हुआ प्यारी बिल्ली, तुम चुप क्यों हो?” बिल्ली ने बोला, “मेरे दोस्त, मैं बुड्ढी हो चुकी हूं, और मुझे तुम्हारे बातें सुनाई नहीं दे रही है। अगर तुम पास आके फिर से बोलोगे, तो ठीक रहेगा।”

बिना सोचे समझे चिड़िया और खरगोश चिड़िया और खरगोश दोनों बिल्ली के पास अपने समस्या बताने चले गए। उसी समय बिल्ली ने मौका देखा, और दोनों को एक साथ पकड़ लिया।

बाकी के पक्षी पेड़ पर बैठे हैरान रह गए, यह सोचते हुए की अगर यह कोई अनजान खतरनाक जानवर से मदद नहीं मांगते तो शायद अब तक जीवित होते।

ब्राह्मण और राक्षस 

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एक बार द्रोणा नाम का एक पंडित था, जिसने अपने जिंदगी के सारी सुख साधन त्याग दिये थे। एक दिन उनका एक भक्त उनसे मिलने आया। भक्तों ने देखा, कि कैसे वह पंडित कमजोर और भूखा था।

उसने पंडित को दो गाय के बच्चे दिए। पंडित ने भक्तों को आशीर्वाद दिया और उसे वहां से भेज दिया। पंडित वह गाय के बच्चे अपने साथ ले गया। और फिर रोज उसे खाना देता, जैसे घी मक्खन और भूसा। जिससे वह स्वास्थ और बड़ी हो जाए।

एक सुबह एक चोर ने देखा की कैसे वह गाय बड़ी और मोटी हो गई थी। उसने उन्हें रात में छुड़ाने का सोचा। उस रात उस चोर पंडित के घर की ओर जा रहा था, तभी अचानक उसके सामने एक राक्षस प्रकट हुआ। राक्षस ने बोला, “मैं हूं राक्षस सत्य वचन, तुम कौन हो?”

चोर ने बोला, “मेरा नाम राकेश है, और मैं यहां से दो मोटी गाय उस पंडित से चुराने आया हूं।” तभी राक्षस ने बोला, “अच्छा चलो, हम दोस्त बन जाते हैं। मैं बहुत भूखा हूं। तो मैं उस पंडित को खा लूंगा, तभी तुम गाय चुरा लेना।” चोर ने बोला, चलो हां ठीक है।

चोर और सत्य वचन पंडित के घर पहुंचे, और उसके घर में झांके। उन्होंने उसे सोते देखा, और सत्य वचन ने तो उसे खाने का इंतजार कर रहा था। जब उन्होंने पंडित को खराटे लेते हुए देखा, वह घर में घुस गए।

राक्षस बोला, “चलो अब मैं इसे खाऊंगा, मैं बहुत भूखा हूं।” फिर चोर बोला, “नहीं नहीं, हमें थोड़ा इंतजार करना चाहिए। मैं पहले गाय चुरा उंगा, नहीं तो पंडित उठ जाएगा। राक्षस ने बोला, “नहीं अगर गाय ने आवाज की फिर मैं रह जाऊंगा।”

दोनों आपस में बहस करने लगे, और इतने में पंडित की नींद खुल गई। पंडित उठकर कहता है, “कौन है वहां? कौन हो तुम लोग? और यहां क्या कर रहे हो?”

चोर ने बोला, “पंडित जी यह राक्षस आपको खाने आया है।” तभी राक्षस ने बोला, “नहीं-नहीं पंडित जी यह चोर आपकी गाय को चुराने आए हैं।” पंडित बहुत डर गया। और उसने भगवान से खुदको बचाने के लिए पर्थना की।

फिर अचानक से राक्षस गायब हो गया। पंडित ने फिर लाठी उठाई, और उस बुरे चोर को भगा दिया। तब पंडित ने कहा, “चोर तो अब भाग गए, अब मेरे गाय भी सुरक्षित है।

असली गधा 

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एक कंजूस सेठएक कंजूस सेठ बाजार से एक गधा खरीद कर अपने घर वापस जा रहा था। रास्ते में दो चालाक ठग खड़े थे। ठग वह लोग होते हैं, जो लोगों को मूर्ख बना कर उनके सामान और रूपए पैसे लेकर भाग जाते हैं।

दोनों  ठग उस सेठ का पीछा करने लगे। थोड़ी दूर चलने के बाद सेठ ने सोचा, “दोपहर हो रहे हैं, किसी पेड़ के नीचे थोड़ा आराम कर लेता हूं।” यह सोच कर सेठ ने गधे की रस्सी अपने प्यार से बांध ली, और एक पेड़ के नीचे लेट कर सो गया।

ठुगों ने देखा की सेठ सो गया है। एक ठग ने गधे के गले से रस्सी खोलकर अपने गले में रस्सी बांध ली, ताकि सेठ को पता ना चले। दूसरा ठग गधा लेकर भाग गया।

नींद खुली तो सेठ ने देखा कि उसके गधे की जगह पर एक आदमी बंधा हुआ है। उसने पूछा, “कौन हो तुम? मेरा गधा कहां है?” ठग ने कहा, “मालिक मैं ही आपका गधा हूं। मैं अपनी मां की बात नहीं मानता था, इसलिए मेरा माने मुझे गधा बना दिया।

उन्होंने कहा था, की जब तुझे कोई दयालु सेठ खरीद लेगा तब तू फिर से इंसान बन जाएगा। आज आप के कारण में इंसान बन गया।” सेठ अपनी तारीफ सुनकर बहुत खुश हुआ।

उसने कहा, “ठीक है, आज मैं तुझे छोड़ देता हूं। सीधा अपने मां के पास जाना, अब उनका कहना मानना। “दूसरा ठग भी आराम से रस्सी खोल कर चला गया।

अगले दिन सेठ फिर से बाजार में गया। वहां वही कथा फिर से बिकने के लिए खड़ा था। सेठ को बहुत गुस्सा आया, वह उस गधे के पास गया और बोला, “गधे तूने फिर से अपनी मां की कहना नहीं माना? बना रहे गधा। अबकी बार मैं तुझे नहीं खरीदूंगा।”

तभी सेठ को वह ठग दिखाई दिया, जो उसे कॉल मिला था। सेठ ने ठग को पहचान लिया। सेठ बोला, ” तू तो कल कह रहा था कि तेरी मां ने तुझे गधा बना दिया था !

मेरे कारण तो फिर से इंसान बन गया, फिर यह गधा कहां से आया? तूने झूठ बोलकर मुझे बेवकूफ बनाया है।”

ठग ने चापलूसी करते हुए कहा, “नहीं दयालु मालिक, आप जैसे होशियार इंसान को कौन बेवकूफ बना सकता है ! यह गधा तो मेरा भाई है। मेरी मां ने इसे भी गधा बना दिया। इसे खरीद कर इसे भी इंसान बना दीजिए।”

मूर्ख सेठ ने फिर से वही कथा खरीद लिया, और उसने घर की तरफ चल दिया। और वह घटना हुबहू फिर से उसके साथ घटी, जो पहले घटी थी। वह सेठ तो बहुत पैसे वाला था, लेकिन बुद्धि के मामले में उसको थोड़ी भी अकल नहीं था।

सांप और नेवला

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एक बार एक ब्राह्मण वन के भीतर चल रहा था। रास्ते में उसने एक नेवला को देखा। ब्राह्मण को वह नेवला बहुत अच्छा लगा। तो वह उसको अपने घर ले गया।

ब्राम्हण नेवला को अपने पत्नी के हाथ में सौंप कर उसका अच्छे से ध्यान रखने के लिए बोला। ब्राम्हण की पत्नी ने वचन दिया कि वह उस नेवला को अपने पुत्र की तरह लालन पालन करेगी।

नेवले को अपने बेटे के साथ सुला दिया। ब्राम्हण के पत्नी अपने पुत्र से अत्यंत प्यार करती थी, और उसे हर बुराई से बचाती थी। कुछ महीने गुजर गए, और नेवला छोटे के साथ साथ बड़ा हो गया।

दोनों हर समय साथ में ही खेलते थे। जैसे नेवला बढ़ता गया, ब्राह्मण की पत्नी को डर लगने लगा, कि यह नेवला का ही उनके पुत्र को कोई हानि ना पहुंचाएं। जब पत्नी ने ब्राह्मण से यह बात स्पष्ट की, तो ब्राह्मण ने उसको बेवजह चिंता ना करने के लिए कहां। और कहां की कुछ भी नहीं होगा।

एक दिन ब्राम्हण के पत्नी को कहीं बाहर जाना था, जाने से पहले उसने ब्राह्मण को बोला कि जब तक वह वापस ना आ जाए, छोटे का ध्यान रखें और सचित रहें। ऐसा कहकर उसका पत्नी बाहर चली गई।

कुछ समय बाद ब्राह्मण को भी कुछ महत्वपूर्ण काम के लिए घर से निकलना पड़ा। ब्रह्मांड छोटे की ध्यान में रखकर चला गया। कुछ देर बाद अचानक से घर के भीतर एक भयानक सा सांप घुस आया।

नेवला ने सांप को देखा, और सोचा कि यह तो छोटे को हानि पहुंचा देगा। छोटे की सुरक्षा करने के लिए, नेवला ने सांप का सामना किया। आखिरकार उसने सांप को मार दिया।

परंतु अब सांप का रक्त नेवला के चारों ओर फैला हुआ था। उसी समय ब्राम्हण के पत्नी घर लौट आई, और वह अंदर आके देखा, तो नेवला खून में लटपट था। और उसको लगा नेवला ने छोटे को हानि पहुंचा दिया।

गुस्से से भरी उसने गमला लिया, और नेवला के सर पर फेंका। जिसके कारण नेवला के मृत्यु उसी समय हो गई। और उसके बाद वह जब दौड़ती हुई अंदर आई, तो अपने पुत्र को सही सलामत सोते हुए पाया। और बाजू में था एक मुर्दा सांप।

ब्राह्मण की पत्नी को तुरंत समझ आया, के असलियत में हुआ क्या था। और फिर अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ।

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