5 Best Short funny story for kids you will laugh (2020)

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5 Great Short funny story for kids

लोमड़ी और बकरी

Short-Funny-Story-For-Kids

एक बार एक लोमड़ी रास्ता भटक गया, और वह एक रेगिस्तान में जा पहुंचा। धूप सर पर था, तो बेचारा चलते चलते थक गया। इतने में उसे एक कुआं दिखा, लोमड़ी ने कुए के पास पहुंचा, और उस पर झांक के देखा। वह कहने लगा, “इसमें तो पानी है, मुझे तो बहुत प्यास लगी है। पर कुआं इतना गहरा है, मैं कैसे पानी पियो!”

वह सोच रहा था, इतने में उसका पैर फिसला, और वह पानी में जा गिरा। और फिर लोमड़ी ने पानी पी जी भर के। और कहने लगा, “अरे वाह, यह पानी तो बहुत मीठा है। मेरे प्यास तो बुझी पर अभी मैं बाहर निकलो कैसे! यह कुआं तो बहुत गहरा है।” और चिल्लाने लगे बचाओ बचाओ।

तभी वहां से एक बकरी गुजर रही थी। उसने लोमड़ी की आवाज सुनी, तक कुएं तक पहुंच गई। उसने कुएं में झांक के देखा। और वह लोमड़ी को देखकर बोला, “दोस्त तू वहां पर क्या कर रहे हो? तुम कुएं में गिरे कैसे?” बकरी के बात सुनकर लोमड़ी को एक उपाय सोचा।

लोमड़ी ने कहा, “बाहर कितनी धूप है, और यह पानी कितनी शीतल और मीठी है। तुम भी अंदर आ जाओ और इस कुएं का पानी पी लो।” तब बकरी ने कहा, “फिर तुम बचाओ बचाओ क्यों चिल्ला रहे थे?” लोमड़ी ने कहा, “मैं तो बचाओ बचाओ नहीं चिल्ला रहा था, कोई आओ यह ठंडे पानी पी लो। तुमने शायद गलत सुना होगा।” तब बकरी बिना सोचे समझे कुएं में कूद पड़ा।

फिर बकरी ने पानी पिया और बोली, “तुम सच कहते हो मेरे दोस्त, यह पानी तो वाकई ही बहुत मीठा है। पर हम बाहर कैसे निकलेंगे?” तब लोमड़ी ने कहा, “मेरे पास एक उपाय है, तुम अगर दीवार के पास खड़े हो होंगे, मैं तुम्हारे पीठ पर चढ़कर ऊपर तक पहुंच जाऊंगा, और कुएं से बाहर निकल जाऊंगा।” 

बकरी ने कहा, “ठीक है, और वह खड़ी हो गई।” और फिर लोमड़ी ने बकरी के पीठ के ऊपर चर गया, और छलांग मारकर खोए से बाहर निकल गया। तब बकरी ने कहा, “दोस्त मेरा क्या होगा? मुझे कौन बाहर निकालेगा? तुमने तो कहा एक उपाय है?’

तब लोमड़ी ने कहा, “मैंने उपाय निकाला था, खुद को बाहर निकालने के लिए। तुम्हें बाहर निकालने की नहीं। तुम खुद के लिए उपाय सोचो, और बाहर निकलो। मैं तो चला।” यह कहकर लोमड़ी वहां से चला जाता है। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि कोई काम करने से पहले हमें सोच लेना चाहिए।

प्यासा कौवा

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एक वक्त की बात है, किसी जंगल में एक कौवा रहता था। एक दिनों से बड़ी जोर से प्यास लगी। वह पानी के तलाश में बहुत दूर-दूर तक उड़ता रहा, परंतु कहीं भी उसे पानी नहीं मिला। वह बहुत थक गया था।

आखिर में उसे एक बड़ी सी पेड़ के पास पानी का घड़ा दिखाई दिया। जिसमें पानी था लेकिन बहुत कम था। जब कव्वे ने पानी पीना चाहा, तो उसकी चोंच पानी तक नहीं जा पहुंची। उसने पानी पीने की बहुत कोशिश की, लेकिन सब बेकार गई।

कौवा परेशान हो गया, तभी उसे एक उपाय सोचा। उसने आसपास के पत्थर लेकर उस घरे में डालना शुरू कर दिया। एक-एक करके उसने अपने चोट से पत्थर तब तक डालने लगा, जब तक पानी ऊपर नहीं आया।

और जब पानी ऊपर आ गया, तब कौवे ने जी भर के पानी पिया। और वह बहुत खुश होकर वहां से निकल गया। यह कहानी से हमें यह सीख मिलता है, बुद्धि है तो, उपाय हैं।

दयालु गाय 

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एक बार की बात है, उधामगर गांव में शुभम नाम का एक किसान रहता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी और पुत्र थे। उसके पास एक गाय और उसका बछड़ा भी था। शुभम एक गरीब किसान था, लेकिन उसकी इच्छा थी, गाय के दूध से मिठाई का व्यापार शुरू करें।

लेकिन गाय बस इतना ही दूध देती थी, की उसकी रोजी रोटी की जरूरत पूरी हो जाए और बछड़ा अपनी मां का दूध पी ले। इसीलिए शुभम अपनी गाय को पास के पहाड़ पर रोज घास चरने के लिए ले जाने लगा।

घास चढ़ते हुए उसके गाय पास रहती नदी का पानी भी पीती, एक दिन जब गाय पानी पी रही थी, उसने नदी की पानी के बहाव के साथ एक बछड़े को किनारे पर आया देखा। गाय ने आश्चर्य से बछड़े को पूछा, “तुम्हारी मां कहां है?

और तुम यहां पर कैसे आए?” बछड़ा जो पानी में भीग चुका था, धीरे से बोला, “मेरे मां ने अपने साथ खास चढ़ने में मना किया था, लेकिन मैं फिर भी आ गया, और गलती से नदी में गिर पड़ा। पानी के तेज बहाव के साथ मैं यहां पहुंच गया।”

गाय उसे अपने दूध पिलाने लगी, और बोली, “प्यारे बछड़े यहां जंगली जानवर रहते हैं, तुम्हें यहां नहीं रुकना चाहिए। मैं भी तुम्हें अपने साथ घर में भी नहीं ले जा सकती। मेरा मालिक शुभम मुझे बड़ी मुश्किल से खिला पता हैं, मैं तुम्हें छुपा कर एक जगह रखूंगी। और रोज आकर तुम्हें अपनी दूध पिलाऊंगी। लेकिन तुम किसी भी कीमत पर बाहर मत आना।”

गाय ने बछड़े को एक सुरक्षित जगह छुपा दिया और घर चली गई। अब क्यों की गाय रोज उस बछड़े को दूध पिला रही थी, शुभम को पहले से ही कम दूध मिलने लगा। यहां तक की गाय के अपने बछड़े को भी दूध कम पढ़ने लगा। तब बछड़े ने गाय से कहा, “मां मैं बहुत भूखा हूं, तुमने अपना दूध मुझे क्यों नहीं पिलाया?”

गाय ने बोला, “मुझे तुम्हारे जैसा एक और बछड़ा मिला है, जो अपने मां से बिछड़ गया है। वह बहुत भूखा था, इसलिए मुझे उसे अपना दूध पिलाना पड़ा। मैं तुम्हें अपना दूध कल जरूर पिलाऊंगी।”

इस तरह हर रोज वह गाय घास चरने पहाड़ी पर जाती, और फिर बछड़े को दूध पिला कर वापस आ जाती। पहाड़ी में गाय के घास चरने बावजूद कम दूध मिलने से शुभम को शक हुआ। उसने सोचा, जरूर रास्ते में कोई और गाय के दूध पी रहा है।

उसने गाय का पीछा किया, घास चढ़ने के बाद गाय उस दूसरे बछड़े को दूध पिलाने गई। यह देख कर शुभम गुस्से में आ गया, और एक छड़ी लेकर गाय को मारने के लिए आगे बढ़ा। तभी वहां एक देवी प्रकट हुई, और शुभम के हाथ के छोरी गायब हो गई।

देवी ने कहा, “शुभम यह तुम क्या कर रहे हो? इस दयालु गाय ने की तुम पर बोझ ना पड़े इसलिए मां से बिखरे इस बछड़े को अपना दूध पिलाया, क्या तुम बिना पूरी बात जाने ही इसको सजा दोगे? यह तो गाय की महानता है, कि उसने इस बछड़े को आश्रय दिया है। लो तुम्हारे व्यापार के लिए मैं तुम्हें पैसा देती हूं। आज से इनकी देखभाल करो।” ऐसा कहकर देवी अदृश्य हो गई।

शुभम को गाय का त्याग समझ में आई । उसे अपनी गलती का एहसास हुआ,और वह उनसे माफी मांगी। शुभम गाय और बछड़े को खुशी खुशी घर ले आया। तब से वह उस गाय और दोनों बछड़े को बड़े प्यार से देखभाल करने लगा।

उसने देवी के दिए कहने को बेचकर, अपना मिठाई का व्यापार शुरू किया। और आधा मुनाफा गरीबों में बांटने लगा। फिर उसने एक गौशाला बनाई, और आस पास घूमने रही बेघर गायों और बचरों को शरण देकर खाना देने लगा। उन गायों में बिछड़े हुए बचरें ने अपने मां को पहचान लिया, और खुशी में कूदने लगा। उसकी मां भी उसको देख कर जैसे फिर से स्वस्थ हो गई। यह देख कर शुभम और उसके गाय बहुत खुश हुए।

बोलने वाला पेड़ 

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एक समय की बात है, रमेश और सुरेश दोनों बहुत ही अच्छे दोस्त थे। वह दोनों साथ में लाला के खेत में काम किया करते थे। दोनों दिन भर बहुत मेहनत करते, और शाम होते ही लाला उन दोनों को कुछ पैसे देता। फिर वह दोनों साथ में घर के लिए निकल पड़ते।

यह उनकी रोज की काम थी। दोनों के आर्थिक परिस्थिति खराब थी। एक दिन की बात है, दोनों दोस्त एक साथ खाना खाने बैठे थे। तभी रमेश ने पूछा, “क्या हुआ भाई आज तुम इतनी चिंतित हो?” सुरेश ने बोला, “क्या बताऊं रमेश भाई, वही बीवी की रोज की खिट खीट, तंग आ गया हूं जिंदगी से।”

रमेश ने कहा, “इसमें भाभी की क्या गलती! हमारी हालात ही ऐसे हैं। अगर एक दिन हम ना कमाए, तो घर में खाने का कुछ भी नहीं होगा।” सुरेश कहां, “काश हम शहर जाके काम कर सकते!” रमेश ने पूछा, “क्या शहर में हमें काम करके अच्छे पैसे मिल जाएंगे?” 

सुरेश ने कहा, “हां, हमारा वह प्रसिद्ध थे ना नंदन, वह शहर गया था, और दो महीने में वह इतने पैसे कमा लिए कि उसने अपना नया घर बना लिया।” रमेश ने कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है, क्यों ना हम भी शहर जाए? और बहुत सारी पैसे कमाए?” सुरेश ने कहा, “विचार तो बहुत अच्छा है, मैं अपनी पत्नी को बताता हूं। और फिर निकल पड़ते हैं।”

सुरेश अपने घर पहुंचा, और अपनी पत्नी को कहां, “विमला तुम्हें पता है आज मैंने और रमेश ने एक निर्णय लिया है, हम शहर जाएंगे और काम करेंगे।” यह सुनकर उसकी बीवी ने कहा, “सच में, इसका मतलब हम भी बहुत जल्दी अमीर हो जाएंगे! हमारे पास भी बहुत सारी पैसे होंगे! गहने होंगे!”

सुरेश ने कहा, “अरे रुको थोड़ा सब्र रखो, अब तक तो मैं गाय भी नहीं, और तुम पहले ही इतना कुछ सोच रही हो।” सुरेश की पत्नी बहुत ही खुश थी। और कुछ ही दिनों में रमेश और सुरेश दोनों शहर के लिए निकल पड़े।

दोनों शहर पहुंचे, और वहां दोनों को जो काम मिलते वह कर लेते। दोनों बहुत खुश थे, क्योंकि शहर में दोनों को बहुत ज्यादा पैसे मिल रहे थे। देखते देखते एक महीना बीत गया। उन दोनों को गांव के बहुत याद आ रही थी, और दोनों ने अच्छी खासी पैसे भी कमा लिए थे। इसलिए दोनों गांव के लिए निकल पड़े।

दोनों गांव के बाहर पहुंचे, बहुत दिन बाद गांव पहुंच कर दोनों को बहुत अच्छा लग रहा था। तब रमेश ने कहा, “मुझे एक चिंता हो रही है, कहीं ना मैं यह पैसे एक साथ खर्च ना कर दूं। तो हम एक काम करते हैं, हम हमारी आधी कमाई इस पेड़ के नीचे रख देते हैं। एक महीने बाद आ कर हम इसे निकाल लेंगे।” सुरेश ने भी उसके बाद को सम्मति दिया, और दोनों ने अपनी आधी कमाई उस पेड़ के अंदर छुपा दिया।

दोनों गांव पहुंचे, और खुशी से जीने लगे। कुछ दिनों बाद सुरेश के पैसे खत्म हो गए थे, और उसका बीवी उसको पैसे के लिए रोप झाड़ रहे थे। तभी सुरेश ने अपने पत्नी को सारी बात बताई। तो सुरेश की बीवी ने कहा, वह दोनों पोटली को छुड़ाने का।

सुरेश रात के अंधेरे में उस पर के पास गया, और उसने दोनों पोटलिया चुरा ली। अब एक महीना हो चुका था, और दोनों पेड़ के पास पहुंचे। पहले रमेश ने पैर के अंदर हाथ डाला, और उसे वहां पर कुछ नहीं मिला। और उसके बाद सुरेश ने पेड़ के अंदर हाथ डाला, और उसको भी वहां पर कुछ नहीं मिलता।

सुरेश ने रमेश को बोला, “जरूर तुमने ही मेरा पैसा चुराया होगा।” रमेश ने कहा,” नहीं नहीं भाई, मैंने चोरी नहीं की।” तभी सुरेश ने बोला, “तुम चोरी की या नहीं अभी यह फैसला पंचायत ही करेगा।” रमेश और सुरेश अप पंचायत के पास पहुंचे।

सुरेश ने पंचायत को बताया, “एक महीने पहले जब हम शहर से लौटे थे, तो हमने अपनी आधी कमाई एक पेड़ में छुपाई थी, और अब जब हम वहां गए, तो वह वहां नहीं है। यह बात सिर्फ मुझे और रमेश को पता थी, और मुझे लगता है रमेश नहीं पैसा चुराई है।” रमेश ने कहा, “नहीं सरपंच जी मैंने पैसा नहीं चुराई।”

सरपंच ने कहा, “यह तो गंभीर मामला है, अभी इसका फैसला कैसे करें।” सुरेश ने कहा, “मेरे पास एक साक्षी भी है, और वह है उस पेड़ में वास करने वाली एक देवी। हम उसे जाकर पूछते हैं।” सभी लोग पेड़ के पास पहुंचे 

पेड़ के पास जाकर सुरेश ने कहा, “हे देवी आप ही बताइए आपके पास रखिए पोटलिया को किसने चोरी की है?” तभी अचानक पेड़ के अंदर से आवाज आई, “कुछ दिनों पहले आधी रात को रमेश ने ही वह पैसे चुराई है।”

रमेश ने कहा, “तुम झूठ बोल रही हो अभी तुम्हें सबक सिखा रहा हूं।” और रमेश ने पास में परी आग उठाई और पेड़ को आग लगा दी। तभी अचानक पेड़ की अंदर से आवाज आई बचाओ बचाओ। तभी सभी ने देखा की सुरेश के पत्नी विमला जो उस पेड़ के अंदर छुपे हुए थे वह चिल्लाते हुए बाहर आ रहा है।

सभी सरपंच ने बोला, “तो यह थी पेड़ में वास करने वाली देवी?” सब समझ गए थे कि मामला क्या है। रमेश ने बोला, “मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी दोस्त।” यह कहकर रमेश वहां से चला जाता है। और सुरेश और विमला बहुत रोने लगे।

तेनाली राम

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बहुत वर्ष हुए विजयनगर में एक राजा राज करता था, उसका नाम था कृष्ण देव राय। एक बार उसके राज्य में चूहे की भरमार हो गई, जिधर देखो चूहे ही चूहे। राजा ने हुकुम सुनाया, “हर घर में एक बिल्ली अनिवार्य रूप में पाली जाए, प्रत्येक घर में एक एक गाय प्रदान की जाए। ताकि दिल्ली को पर्याप्त मात्रा से दूध मिल सके।”

तेनालीराम नाम का एक वजीर इस आज्ञा से नाखुश था, उसके अनुसार यह सारा प्रयोजन ही मूर्खतापूर्ण था। उसने एक तरकीब सोची, पहले ही दिन उसने अपनी बिल्ली के आगे, खोलते हुए हैं दूध के एक कटोरा उसके पीने के लिए रख दिया।

बिल्ली ने जैसे ही उसमें मुंह डाला, उसका मुंह जल गया। उसकी आंखें बाहर निकलने को हो रही थी। वह झट से दौड़ गई। राजा को सभी और पूरी तरह बलिष्ठ बिल्लियां नजर आने लगी। वह अपनी आज्ञा से बहुत प्रसन्न था।

वह घर घर जाकर खुद देखता था कि सब ठीक-ठाक है या नहीं। आखिर वह तेनालीराम के घर पहुंचा। राजा को तेनाली राम के यहां बिल्कुल कमजोर हड्डियों का ढांचा बनी बिल्ली देख कर गहरा झटका लगा।

राजा ने पूछा, “क्या सारा दूध तुम खुद ही पिए जा रहे हो?” तेनाली राम ने कहा, “महाराज अगर जान बक्से तो सब कुछ आपसे सच सच कह दूं।” राजा ने बोला, “हां हां तुम निर्भय होकर, सब विस्तार से बताओ।”

तेनाली राम ने कहा’ “महाराज पता नहीं क्या हुआ, मेरी बिल्ली ने तो दूध ही नहीं पी रही है।” महाराज ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? बिल्ली कैसे नहीं दूध पीता है हमको दिखाओ जरा?” तेनाली राम ने कहा, “ठीक है आप स्वयं ही देख लीजिए महाराज।”

तेनालीराम ने एक दूध का कटोरा लेकर बिल्ली के आगे रख दिया। और जैसे ही उस बेचारी बिल्ली ने दूध का कटोरा देखा, और डर कर छठ से वहां से भाग गई। अब तो राजा को सारा मामला समझने में देर ना लगी, के तेनालीराम ने क्या किया था।

उसने हुकुम सुनाया, “तेनालीराम को बंदी बना लिया जाए। और उसके पेट पर सो कोड़े लगाया जाए।” तेनालीराम ने नजरे उठाए बिना कहा, “ठीक है महाराज,मुझे सक्त से सक्त सजा दे। परंतु जरा सोचिए, कि हम देशवासियों के पीने के लिए भी जब दूध पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है, तो क्या यह मूर्खता नहीं है? कि हम सारा दूध बिल्लियों को पिला दे?”

राजा को बात समझ में आ गई, उसने तेनालीराम को माफ कर दिया। और अपने देशवासियों को वह गाय उनके परिवार को दूध पीने के लिए ही रखने के लिए कह दिया। बिल्लियां तो चूहे खाकर भी अपना पेट भर सकती थी। मानव की सेवा सर्वोत्तम है, राजा ने यह बात अच्छी तरह समझ गया था।

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