5+ Best short Hindi motivational story PDF (2020)

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5+ Best short Hindi motivational story PDF (2020)

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समय ही धन है 

अजय पाठशाला से घर लौटा है। उसका मां ने कहा,”अजय बेटा क्या बात है? परीक्षा में प्रश्न पत्र ठीक नहीं था क्या? तुम इतनी उदास क्यों हो?

क्या हुआ है बताओ तो सही? “अजय ने कहा,”मां मैं स्कूल देर से पहुंचा, मेरी बास छूट गई थी।”और अजय के बात सुनकर उसके पिताजी ने कहा,”समय की पड़वा करनी चाहिए, समय का बारा महत्व है।”

अजय ने कहा,”पिताजी समय ना रहने में पूरा प्रश्न पत्र हाल ना कर पाया। आखरी प्रश्न रह गया।”यह सुनकर उसका पिताजी ने कहा,”तुम्हें मालूम है कि वक्त पर स्टेशन ना पहुंचे तो गाड़ी छूट जाती है।”

अजय की मां ने कहा,”अजय यह सच है की समय के अभाव में अच्छे अच्छे मौके अपने हाथ से निकल जाते हैं।”

पिताजी ने कहा,”इसीलिए बरे बूढ़े कहते हैं की, समय ही धन है। वह अनमोल है।” अजय ने कहा,”पिताजी, मां अब मैं वादा करता हूं कि अपना सारा काम ठीक समय ही करूंगा।”

अजय की मां ने कहा,”सभी महापुरुष समय के पाबंद थे, जैसे सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, खुदीराम बोस आदि नेता समय के बारे पाबंद थे।

बे अपना अपना काम ठीक समय पर ही किया करते थे। उनके जीवन में आलस्य का कोई स्थान नहीं था। इसीलिए उन्हें जीवन में सफलता मिली थी।”

पिताजी ने कहा,”जो हुआ, सो हुआ। अजय तुम जाओ हाथ मुंह धो कर खाना खा लो। और आगे से ध्यान रखना हर कम सदा समय पर ही हो।आलस्य बहुत बुरी चीज है।”

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अच्छा पड़ोसी कौन 

एक जंगल में शेरों का एक परिवार रहता था। शेर की बच्ची बहुत ही अच्छे और सभ्य थे। अपने बच्चों को यह सिखाने के लिए कि क्या गलत है और क्या सही है। शेरनी को बहुत कष्ट उठाना पड़ा था।

उस शेरों के परिवार के पास ही गीदड़ और गीदड़नी अपने बच्चों के साथ पड़ोसियों के समान रहते थे। गीदड़ के बच्चे बहुत ही जंगली और असभ्य ढंग से खेलते थे।

इस कारण शेर और उसके पत्नी शेरनी ने अपने बच्चे को उनके साथ खेलने को मना कर रखा था। परंतु गीदड़ के बच्चे शेर की मांद के पास आ कर शेर के बच्चों के साथ मित्रता करना चाहते थे।

पर शेरनी अपने बच्चे को सदा उनसे दूर रखती थी। और गीदड़ के बच्चों को वहां से हटा देती थी। शेर के बच्चों ने अपने मां शेरनी से पूछा,”मां हम लोग गीदड़ के बच्चे के साथ क्यों नहीं खेल सकते?”

शेरनी ने अपने बच्चों को समझाते हुए कहा,”मैं तुम सबको सदा बुरी संगत से दूर रखती हूं। नहीं तो तुम लोग भी उनके सामान दुष्ट हो जाओगे। फिर कोई भी तुम लोगों को पसंद नहीं करेगा, और ना ही तुम्हारे साथ खेलेगा।”

एक दिन शेरनी माने सोचा की हमारे बच्चों को शेरों के सामान दहाड़ना आना चाहिए। वैसे तो यह आपस में बहुत खेलता रहता है, यह एक दूसरे के गलती पर हंसते भी है।

इधर गीदड़ के बच्चों ने देखा कि शेर के बच्चे दहाड़ ने में बहुत आनंद लेते हैं। अतः उन्होंने भी शेर के बच्चों के सामान दहाड़ना चाहा। पर वह गीदड़ के सामान चिल्ला कर गुंरने लगे।

शेर के बच्चे भी गीदड़ के बच्चों को देखकर और उनका चिल्लाना सुनकर, हंसी हंसी में उनके सामान गीदड़ की आवाज में चिल्ला कर गुंरने की कोशिश करने लगे।

इस प्रकार शेर के बच्चों ने गीदड़ की बच्चों की नकल करने लगे। मां शेरनी ने सोचा कि वह अपने बच्चों को ऐसा करने से कैसे रोके!

वह उन को समझाते हुए कहने लगी,”यदि कोई तुम्हें ऐसा करते हो सुनेगा तो वह सोचेगा, के जब तुम दूसरे की आवाज नकल कर सकते हो, तो तुम दूसरे की बुरी आदतों को भी नकल करोगे।

तुम्हें चाहिए कि पड़ोसियों की यदि बुरी आदत है, तो उनकी बूढ़ी संगत से बचकर रहो।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि,”सदा अच्छी संगत करो क्योंकि बुरी मित्र बुरी संगत में डालकर परेशानी में फंसा देते हैं। और इस प्रकार ढेरों शत्रु बन जाते हैं।

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उपकर नहीं अपकार

एक घने जंगल में एक बहुत बूढ़े मुनि अपनी कुटी में रहते थे। बे रात दिन ईश्वर की भक्ति में लगे रहते थे। उनको बहुत से जादू मंत्र भी आते थे। मुनी महात्मा के कुटी में एक चुहिया का बिल भी था।

चुहिया इधर-उधर, उछल कूद करती हुई फिरती थी। वह रात आने पर अपने बिल में चली जाती थी। मुनि उसको दिन में कुछ ना कुछ खाने को देते थे। कभी-कभी वह मुनि के गोद में भी चर जाते थे।

पर मुनि उसे कुछ नहीं कहते थे। इस कारण वह मुनि से हिल मिल गई थी। एक दिन सुबह मुनि महाराज उनके कुटी में नहीं थे, बे बाहर घूमने चले गए थे।

उस दिन चुहिया भी कुटी से बाहर दूर घूमने चली गई। वह उछल कुद करती चल रही थी। अचानक एक बिल्ली उसे देख कर उसके ऊपर झपटि।

चुहिया घबरा गई। वह जान बचाकर कुटी की ओर भागी, और झटपट बिल में घुस गई। लेकिन बिल्ली स्कूटी के बाहर बैठी रही।

थोड़ी देर बाद मुनि महात्मा लौट आए। बिल्ली उनको देख कर भाग गई। मुनि महाराज कि आवाज सुनकर, चुहिया दिल से बाहर आई। वह घबराई हुई थी और रो रही थी।

मुनि ने उसे हाथ में उठाकर, उसके सिर पर हाथ फेर कर मंत्र पारा, चुहिया झट से बिल्ली बन गई। चुहिया आब बिल्ली बनकर बहुत खुश थी।

कुटी के आसपास घूम कर अपना शिकार करती और वही रहती थी। एक दिन एक कुत्ते ने उसे देख लिया, वह गुर्रता हुआ उसके ऊपर झपटा। बिल्ली बानी चुहिया फिर से डरकर कुटी के अंदर भाग गई।

मुनि को देखकर कुत्ता भाग गया। इस बार मुनि महाराज ने मंत्र पढ़कर उसे कुत्ता बना दिया। अब चुहिया कुत्ता तो बन गई पर जंगल में भेड़ियों को को देखकर कुटी में भाग आई।

मुनि ने उसे घबराते हुए देखकर भेड़िया बना दिया। पर भेड़िया बंद कर वह खुश नहीं हुई। इस कारण मुनि महाराज ने इस बार नया मंत्र पढ़कर उसे शेर बना दिया।

अब चुहिया शेर बनकर सारे जंगलों में राज करने लगी। मनचाहा शिकार कर जंगल में ही रहने लगी। इसी तरह कई साल बीत गए।

एक दिन जंगल में उसे खाने के लिए कुछ नहीं मिला, भूख से व्याकुल होकर उसे मुनि की याद आई। वह दहाड़ती हुई मुनि की कुटी की ओर भागने लगी।

कुटी का दरवाजा तोड़कर वह अंदर घुस गई। मुनि महाराज सब समझ गए, उन्होंने झटपट मंत्र पढ़कर कहा,”फिर चुहिया बन जा”! और शेर से अब वह फिर से चुहिया बन गई।

मुनी ने फिर कहा,”जाओ आपने बिल में छुप जाओ।”

फिर उसके बाद मुनीबर को उस चुहिया कभी दिखाई नहीं दी।

जीवन में इच्छा है तो रहती है सदा, पर भलाई के बदले मात दे बुरा।

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शेरनी का घमंड 

बहुत समय पहले की बात है, जानवरों की राज्य में एक शेरनी रहती थी। वह बहुत ही सुंदर थी, और उसका पति जंगल का राजा था।

वह बहुत ही दयालु और न्याय प्रिय था। पर वह खुद बहुत घमंडी थी। ओ जंगल की किसी ही जानवर से बात नहीं करती थी।

वहां बंदरों का एक झुंड था, जब शेरनी उस जून के सामने से चाहते थे तो बंदरों ने उसे नमस्ते करते हुए कहता था, नमस्ते शेरनी जी। पर उसने उनके बातों का कोई जवाब नहीं दिया।

बंदरों के झुंड सोचता था के शेरनी इतना घमंडी क्यों है?

खोलो आपस में कहते रहते थे, लगता है शेरनी हमें छोटे और कमजोर समझते हैं। और जब शेरनी की कोई मदद की जरूरत होंगे तो हम उसे मदद नहीं करेंगे।

एक दिन जब शेरनी सो कर उठी, उसने देखा उसके बच्चे गायब है। उसने उन सबको सब जगह ढूंढा। पर वह उसको कहीं नहीं मिले।

अंधेरा होने लगा, और उसका चिंता बढ़ने लगी। वह बंदरों के पेड़ के पास गई, और उन्हें पुकारने लगी,

“बंदर वह बंदर, क्या तुमने मेरे बच्चों को देखा है?”

बंदरों ने नीचे आकर शेरनी से पूछी,”क्यों रानी मां आप यहां? क्या आप हम से बात कर रहे हैं? हमको कुछ भी कैसे पता हो सकता है? इतने शोर से कुछ और जानवर वहां इकट्ठा हो गए।

तो शेरनी ने हिरण को देख कर उसे कहा,”क्या आप मुझे मदद करेंगे?”लेकिन हिरण ने कहा,”नहीं रानी मां मैं तो बिल्कुल बेकार जानवर हूं, मैं आपकी मदद कैसे कर सकता हूं?”

भालू को देखकर शेरनी ने, “कहा क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो भालू? क्या तुमने मेरे बच्चों को देखा है?”

भालू ने कहा,”यह कैसे हो सकता है? क्या तुमने अपने बच्चों को मना नहीं कर दिया था कि मेरी जैसे बदसूरत जानवर से दूर रहे?”

शेरनी ने विनती करते हुए कहा,”क्या कोई भी किसी ने मेरे बच्चों को देखा?”लेकिन सारे जानवर ने कहा,”नहीं रानी मां आप हमसे और हम आपसे कोई मतलब नहीं रखते!”

यह सब सुनकर रानी रोने लगती है। और वो कहने लगा,”इसमें सब मेरी गलती है, मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है। मुझे माफ कर दो। मैंने नहीं समझा कि एक दोस्त को होना कितनी जरूरी है। अपने घमंड के आगे मैंने किसी के ऊपर ध्यान नहीं दिया। और अब कोई भी मेरी मदद नहीं करेगा।”

शेरनी को रोता देख कर सभी जानवरों को बहुत दुख हुआ। और फिर भालू ने कहा,”चिंता मत करो रानी मां, हम तुम्हारे बच्चों को ढूंढगे, तुम्हारी मदद करेंगे।

हम बस तुम्हें यह महसूस करा देना चाहते थे कि आपके व्यवहार से हमें कितना बुरा लगता है। शेरनी ने रोते हुए कहा,”मैं समझ सकती हूं, मुझे माफ कर दो।”

और सारे जानवर बोलने लगी,”चलो सब मिलकर राजकुमारों को ढूंढते हैं।”और फिर सब जानवरों ने मिलकर बच्चों को ढूंढना शुरू कर दिया।

सारे जानवरों ने इधर उधर बहुत ढूंढा। आखिरकार जिराफ ने बच्चों को ढूंढ निकाला। वह हिरण और कछुआ के बच्चों के साथ खेलने में मगन थे।

बच्चे को देखकर जिराफ ने चिल्लाते हुए, देखो बात तो यहां पर है। और फिर मां और बच्चों का मिलन हो ही गया।और फिर शेरनी में अपने जानवर दोस्तों को कभी अपमान नहीं किया। और वह सब जंगल में खुशी खुशी रहने लगे।

घमंड खुद के लिए भी बहुत हानिकारक है।

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दो सिर वाला कबूतर

किसी जंगल में बहुत सारी पशु पक्षी रहते थे। होली में एक बहुत ही विचित्र पक्षी भी रहता था। कबूतर, उसका दो सीर थे, शरीर एक ही था।

सारे जानवर ने मिलकर उसका मजाक उड़ाते थे। और उसे खूब चिढ़ाते थे। जानवर के दूर व्यवहार से उस पक्षी की एक सिर बहुत दुखी रहता था। हालांकि दूसरे सिर इसे अपना बुरी किस्मत समझ कर खुश रहता था।

अलग-अलग विजय होने के कारण दोनों में अक्सर झगड़ा हुआ करता था। पहले वाला सिर ने दूसरे सिर को कहा,”हमें सब इतना मजाक उड़ाते हैं तुम्हें क्या बुरा नहीं लगता?”

दूसरे सिर ने जवाब देता है,”बुरा क्यों लगे? भगवान ने मुझे अनोखा बनाया है, मैं तो बड़ा खुश हूं।”एक सिर को अगर कुछ खाने को मिलता, तो वह अपने साथी सिरको नहीं देता।

ऐसे ही जब दूसरे सिरको कुछ खाने को मिलता था वह पहले सिरको नहीं देता था। कभी-कभी तो वह एक दूसरे को चिढ़ाने की वजह से खाते रहते थे।

एक दिन पहले सिडको बहुत मीठा फल मिला। तो वह दूसरे सिरको दिखाते हुए वह फल खाने और कहने लगता है,”वाह कितना मीठा फल है, और इसका खुशबू भी कितना सुंदर है।”

यह सुनकर दूसरे सिर ने कहा,”मुझे भी थोड़ा चखने के लिए दे दो ना! और फिर हम दोनों का पेट तो एक ही है।” तो पहले सिर ने कहा,”चाहे तू खाए या मैं, जाएगा तो एक ही पेट में है ना?”

यह सुनकर दूसरे सिर ने कहा,”हां मगर इसका स्वाद तो बस तुम ही ले पारहे हो ना?थोड़ा सा मुझे भी दे दोगे तो क्या हो जाएगा?”

पहला सिर ने कहा,”यह स्वादिष्ट कॉल मुझे मिला है,और मुंह भी मेरा है, मैं इस मुंह से चाहे जो खाऊं, चाहे जितना खाऊं, चाहे तो फेंक दूं, इसका अधिकार पूरा मेरा है।”और यह कह कर पहला सीन पूरा फल खा गया।

दूसरे को यह बात इतना बुरी लगी, कि उसने पहला सिर के बारे में बदला लेने को सोचा। एक दिन तहला सिर जब दोपहर के खाना खाकर सो गया, तब दूसरे शेर ने अपने दोस्त कालू नाम के एक कव्वे को फल वाली सारी बात बताई।

और यह भी कहा,”दोस्त कव्वे, मुझे कोई ऐसा स्वादिष्ट फल के बारे में बताओ ना जो खाकर मैं इसे बदला ले सकूं।”तो उसका दोस्त कौवे ने बोला,”एक ऐसा फल है, जिसे तुम खा लोगे तो पेट खराब हो जाएगा। और उसके वजह से तुम दोनों दो-तीन दिन तक कुछ नहीं खा पाओगे। तुम एक फल खाकर उसे सबक सिखा सकते हो।”

दूसरे सिर ने कहा,”सही कहा दोस्त, मैं ऐसा ही करूंगा।”कौवा बोला,”पर ध्यान रहे, ज्यादा खाने पर चांद भी जा सकता है। ध्यान से खाना”दूसरे वाला सीन सम्मति दे कर बोलता है,” ठीक है दोस्त, मैं ध्यान रखूंगा।”

थोड़ी देर बाद, जब पहले फिर की आंखें खुली तो उसने दूसरे सिर के ऊपर जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। पहले सिंह ने बोला,”अभी तक कुछ खाया क्यों नहीं कामचोर? भूख की वजह से मेरा नींद खुल गई।”

तब दूसरे सिर में बोला,”तो इसमें मैं क्या करूं? मेरी मर्जी चाहे मैं खाऊं या ना खाऊं!”दोनों थोड़ी देर तक यूं ही लड़ते रहे।

उसके बाद दूसरे ने पहले से बदला लेने को सोची। और चालाकी से बोला,”मेरे दोस्त कव्वे ने एक स्वाद से भरपूर फल के बारे में बताया, मैं तो आप वही खाऊंगा।”

पहला सीर पूछने लगे,”कैसा स्वाद से भरा फल?”दूसरा सिर ने बोला,”हां खाना है तो मेरे साथ चलो, वह फल सिर्फ मेरे दोस्त कव्वे को पता है, चलो मैं ले चलता हूं।”

उसके बाद दोनों फल के पास पहुंचते हैं। पहला इस फल को पहचान जाता है। और दूसरे को उस फल खाने से मना करता है। पहला सिंह ने बोला,” यह शहर का पौधा है, इस फल को मत खाओ, वरना हम मारे जाएंगे।”

दूसरी सिर ने कहा,”तुमने मुझे वह मीठा फल खाने से मना किया था ना, और यह मेरा फल है, और यह मेरा मुंह है, मेरा जो मर्जी चाहे मैं खाऊं, तो अब मेरी बारी है।”

पहला शिरके लाख माना करने के बावजूद भी दूसरे सिर में नहीं माना। और बदले की चाह में उसने उस पल को खा लिया। और उसका नतीजा यह हुआ कि वह दोनों वहीं पर मर गए।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, के स्वार्थ से बचकर हमें एकता की शक्ति को पहचानना चाहिए। स्वार्थ हमेशा खतरनाक होता है। जबकि एकता का बल बहुत अधिक होता है।

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मां की ममता

एक जंगल में, एक बंदरिया के पास दो बच्चे थे। उसका बड़ा बेटा चिंटू, सूरत से इतना अच्छा नहीं दिखता था। जितने की उसकी छोटी बहन चिंटी बहुत अच्छी दिखती थी।

उसका बड़ा बेटा सदा यही सोचता था, कि उसकी मां संभव है, उसकी छोटी बहन को अधिक चाहती है। क्योंकि और दिखने में कुरूप दिखता है। पर ऐसा नहीं था।

बंदरिया मां तो दोनों बच्चों को बहुत प्यार करती थी। एक दिन अचानक बहुत भयानक तूफान आया, हवा आंधी बहुत जोर जोर से चल रही थी। चारों ओर पेड़ और उनकी शाखाएं जोर की आवाज के साथ गिर रही थी।

बंदरिया मां बहुत भयभीत और चिन्तित हो गई, की वे अगर उस स्थान से शीघ्र नहीं भागे तो, उसे और उसके दोनों बच्चों को चोट लग सकती है।

इसलिए बंदरिया मां ने अपने छोटे बच्चों को उठाकर सीने से लगाया। और वहां से इतनी तेजी से दौर परी जितनी तेज वह दौड़ सकती थी।

बंदरिया मां का बड़ा बच्चा चिंटू भी बहुत अधिक डर गया था। वह जल्दी से कूदकर अपनी मां की पीठपर चिपककर बैठ गया।

अब उसकी मां एक पेड़ से दूसरे पैर पर कुंदती हुई दो रही थी। तभी अचानक एक पेड़ की डाल टूट गई और वे तीनों नीचे गिर पड़े।

बड़ा बेटा चिंटू जो अपनी मां के पीठ पर था, उसको तो बिल्कुल चोट नहीं आई। परंतु छोटा बच्चा जो अपनी मां के गोद में था, उसको नीचे गिर कर बहुत चोट लग गई थी। और उसकी चोट से बहुत खून भी निकल रहा था।

इस कारण बंदरिया मां अपने छोटे बच्चे के लिए बहुत चिंतित हो गई थी। दूसरे और अपने बड़े बेटे को सुरक्षित देखकर बंदरिया मां प्रसन्न भी थी।

उसका बड़ा बेटा चिंटू दौड़ कर गया और कुछ बेरी और पत्ते लेकर आया, ताकि उसकी मां उसकी छोटी बहन की गांव पर उसे लगा सके।

बंदरिया मां अपने बारे बेटे चिंटू को ऐसा करते देख कर बहुत प्रसन्न हुई। और उसको अपने बेटे पर बहुत गर्व हुआ। मां ने अपने बेटे को धन्यवाद देते हुए बहुत बार उसको प्यार किया और बार-बार चूमने लगे।

वास्तव में बंदरिया मां अपने दोनों बच्चे को बहुत प्यार करती थी। अब उसके बारे बेटे चिंटू ने भी यह शिखा,

के उसकी मां उसकी छोटी बहन के लिए इसलिए चिंतित थी क्योंकि वह बहुत छोटी थी। और अपने लिए कुछ भी नहीं कर सकती थी।

अतः ओ बहुत ज्यादा खुश था, की उसकी मां उसको भी उतना ही ज्यादा प्यार करते हैं जितना उसकी छोटी बहन को करती है। और उसके बाद वे बहुत खुशी से रहने लगा।

END

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