Top 5 Short Hindi Story On Friendship pdf (2020)

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Short Hindi Story On Friendship

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सच्ची दोस्ती

यह कहानी है नटखट गट्टू और उसका बहन चिंकी की। एक बार गट्टू और चीन की घर के गार्डन में खेल रहे थे, कि तभी उन्हें एक कुत्ते की भोगने का आवाज सुनाई दी।

पहले तो उन्होंने उस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब कुत्ते ने भोगना बंद नहीं किया तो, चिंकी गेट के पास देखने गई, के आखिर में कारण क्या है।

चिंकी कुत्ते को बोला, क्यों भोग रहे हो? क्या हुआ?

गट्टू ने बोला, तो ऐसे नहीं मानेगा, अभी इसे बताता हूं।

यह कहकर गट्टू ने एक पत्थर उठाकर कुत्ते को मारने गए।

चिंकी उसको रोकते हुए कहा, रुको गट्टू, इस तरह किसी बेजुबान जानवर को मारना गलत है। चलो इसे अंदर लेकर चलते हैं। चिंकी प्यार से उसको उठाया और घर के अंदर ले गई।

उसके जखम साफ किया, उसको मरहम पट्टी की, पानी पिलाया और बहुत प्यार किया। चिंकी ने कुत्ते को बोला,

“आप तुम ठीक हो जाओगे और हमारे साथ ही रहोगे। लेकिन हम तुम्हें क्या कहकर बुलाएंगे? तुम्हारा नाम मोती कैसा रहेगा? आज से हम तुम्हें मोती कह कर बुलायेंगे।”

गट्टू ने बोला,”यह हमारे साथ नहीं रह सकता, छी ! कितना गंदा है यह !, नटखट गट्टू को यह बात पसंद नहीं आई। भला कोई ऐसे गंदे जानवर को कैसे इतना प्यार कर सकता है। बस यही ख्याल गट्टू के मन में चल रहा था, कुछ भी हो जाए मैं इस कुत्ते को यहां से भगा कर दम लूंगा।

चिंकी को मोती से इतना प्यार करते देख गट्टू के जलन के मारे बुरा हाल था। लेकिन नटखट गट्टू कहां रुकने वाला था। मोती घर से भाग जाए इसलिए गट्टू शैतानी बुद्धि अपनाने लगा। लेकिन जब-जब गट्टू मोती को तंग करने सोचता, तब तब चिंकी आकर उसे बचा लेती।

मोती को बाहर बंद देख गट्टू को एक तरकीब सोची, “आज मैं तुझे ऐसी जगह छोड़ के आऊंगा की तू कभी वापस नहीं आ पाएगा।”

चिंकी नींद से उठ कर देखती है मोती कहीं नहीं है, वह गट्टू को पूछता है,”गट्टू तुमने मोती को कहीं देखा है?

वह पता नहीं कहां चला गया।”

गट्टू ने बोला,”नहीं तो, मैं तो सो रहा था।” पिंकी का रो रो के बुरा हाल था। गट्टू को चिंकी के लिए दुख तो बहुत था, लेकिन वो खुश था क्योंकि मोती चला गया था।

गट्टू सिंह की को बोला, “रो मत चिंकी, हो सकता है मोती खुद कहीं चला गया हो।” चिंकी ने रोते हुए कहा, “वह मेरा बेस्ट फ्रेंड था।”

फिर उस रात घर में एक चोर घुस आया। आधी रात में किसी को चिल्लाते देख कर चिंकी और गट्टू के मां बाप जग गया। वह कहने लगा, यह कैसा शोर है? लगता है कोई मदद के लिए चिल्ला रहा है।

चिंकी ने गट्टू को नींद से उठा कर बोला,”गट्टू उठो, मैंने अभी-अभी मोती की आवाज सुनी।” लेकिन गट्टू ने उसको मना करते हुए कहा,”रुको चिंकी, सो जाओ मोती नहीं आने वाला।” लेकिन वह चिंकी को रोते देखकर बोला, ठीक है चलो”

वह लोग बाहर आकर देखता है कि, एक आदमी बहुत चिल्ला रहा है। वह बोल रहा है, “कोई बचाओ मुझे इस कुत्ते से।”

पिंकी ने मोती को देखकर उसको बोला,”छोड़ दो उसे मोती।” लेकिन इसने तो कभी किसी को नुकसान नहीं किया! फिर कौन हो तुम?

तब गट्टू के नजर उस आदमी के पास पड़ी अपनी साइकिल पर पड़ी, वह जमीन पर गिर पड़ी थी। गट्टू ने बोला,”मैं सब समझ गया हूं, यह एक चोर है और यह मेरा साइकिल चुराने आया था! क्यों सही कह रहा हूं ना?”

पिंकी ने बोला,” तो तुम चोर हो? इससे पहले की मैं मोती को तुम्हारे ऊपर छोड़ दूं, भाग जाओ यहां से।” 

और उस चोर ने जितनी तेज हो सके, इतनी तेज वहां से भाग गए।

गट्टू ने कहा,”मुझे माफ कर दो चिंकी, वो इसलिए की मुझे इसका हमारे घर आना बिल्कुल पसंद नहीं था। इसलिए मैं मोती को घर से दूर जंगल में छोड़ आया था।

लेकिन यह वापस कैसे आया?”

चिंकी ने बोला,”यही तो खास बाते होती है इनकी। यह जिन्हें अपना दोस्त बना लेते हैं, उसका साथ कभी नहीं छोड़ते। जब तुम मोती को जंगल छोड़ आए, तो वह खुद हमारे घर चला आया। चोरों को अंदर घुसते देखा,

तो उसको जमकर खबर ली।”

गट्टू ने कहा,”सही कहा चिंकी, हम सभी को इस बेजुबान जानवरों से सीखना चाहिए, की सच्ची दोस्ती किसे कहते हैं।” और इस तरह गट्टू को अपना गलती की एहसास हो गया। उस दिन से गट्टू और मोती की बीच अच्छी दोस्ती हो गई।

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तीन मित्रों

एक बन में एक तालाब था, उस तालाब में एक बड़ा सा कछुआ रहता था। तालाब के किनारे एक पेड़ था, जिस पर एक कौवा रहता था। पास ही झाड़ियों में एक हिरण भी रहता था।

तीनों में मित्रता हो गई। सुबह शाम तीनों मिलते, एक दूसरे का हालचाल पूछते, और हंसी मजाक करके अपना समय गुजरते।

एक दिन एक मछुआरा उस तालाब पर आया। उसने तालाब में जाल डालकर, कछुए को पकड़ लिया। मछुआरे ने कछुआ को रस्सी से बांधकर एक लाठी पर टंगा, और चल दिया।

अपने मित्रों को संकट में देखकर कौवा और हिरण चिंता में पड़ गए। उन्हें पता था की मछुआरा उनके मित्रों को मरकर खा जाएगा। वह कछुए को बचाने का कोई उपाय सोचने लगे।

काफी सोच-विचार के बाद उन्हें एक विचार सोच गया। उसके बाद हिरण उस रास्ते पर जाकर लेट गया, जहां से मछुआरा कछुए को लेकर गुजरने वाला था। और कौवा भी उसके पास के एक पैर मैं जाकर बैठ गया।

हिरण एकदम मुर्दा बंद कर लेटा हुआ था, जब मछुआरे ने रास्ते में एक मोटा तगड़ा हिरण को मरा पड़ा हुआ देखा, तो उसे लालच आ गया।

उसने सोचा,’ कछुआ तो है ही, क्यों नाइस हिरण को भी ले चलूं ?’ इसकी चावड़ी भेजने से बहुत सारे धन मिलेगा। लेकिन मछुआरे के पास एक ही रस्सी थी। जिससे उसने कछुए को वादा हुआ था।

उसने कछुए को खोल कर एक तरफ छोड़ दिया, मुक्त होते ही कछुआ चुपचाप खेतों में घुस गया और तालाब की ओर चल दिया।

मछुआरा लाठी लेकर कछुए वाली रस्सी से हिरण को बांधने के लिए उसकी तरफ बड़ा, जैसे ही हो हिरण के पास पहुंचा, बेर की डाल में बैठा कौवा बोल उठा,” कांब

कांब ।”

अपने मित्र कौवे की आवाज सुनते ही हिरण उछलकर भाग खड़ा हुआ। मछुआरा बेचारा देखते रह गया। इस तरह ना तो उसे कछुआ मिला और ना ही हिरण।

शाम ढलने पर तीनों मित्र तालाब के किनारे मिले। कछुए ने अपने प्राण बचाने के लिए हिरण और कवर को धन्यवाद देना चाहा। तो वह बोले, “धन्यवाद की कोई आवश्यकता नहीं है मित्र। सुख दुख में काम आने वाले  ही तो सच्चे मित्र होता है।”

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जादुई पेंसिल 

एक गांव में कुशल नाम का एक लड़का रहता था। उसे चित्र बनाना बहुत पसंद था। वह पत्थर और  छोटी लकड़ियों से, कच्ची जमीन पर रेत पर चित्र बनाते रहता

उसके पास पेंसिल और कागज खरीदने के पैसे नहीं थे। वह हमेशा सोचता था, काश मेरे पास पेंसिल होती तो मैं कितने सुंदर चित्र बनाता।लेकिन वह रोज अपने लगन से चित्र बनाते रहता।

लेकिन एक दिन जब वह चित्र बना रहा था, उसे एक बूढ़ा आदमी मिला। उसने कुशल को पेंसिल दी और कहां,”तुम इससे केवल गरीबों का चित्र बना कर देना, और कभी जरूरत पड़े तो इसी पेंसिल के सहारे तुम मुझे बुला लेना।” यह कहकर वह बूढ़ा आदमी गायब हो गया।

कुशल बहुत खुश हुआ, उसने एक आम का चित्र बनाया। और अचानक ही वह आम असली हो गया। फिर उसने एक कुत्ते का चित्र बनाया, वह भी असली कुत्ता बन गया।

ओ कहने लगा,” यह क्या यह तो एक जादुई पेंसिल है। बहुत-बहुत शुक्रिया बुरे चाचा। आपकी यह बात मैं हमेशा याद रखूंगा।”

आप कुशल ने खाने का चित्र बनाया, वह भी असली खाना बन गया। फिर उसने अपनी मां और पिताजी के लिए, कपड़े-खाना-फल-अनाजों के चित्र बनाएं, और सब के सब असली बन गए।

कुशल गरीबों को जो भी चाहिए होता था, वह बना कर दे देता था। गांव के लोग कुशल से बहुत ही खुश थे। क्योंकि वह गरीबों का सहायता करता था।

यह खबर राजा के कानों तक पहुंची। राजा ने कुशल को बुलाकर आदेश दिया,” पहले एक सोने का पेड़ महल के बगीचा में बना दो। और तुम्हारे ए पेंसिल मेरा हवाले कर दो।”

कुशल ने बोला,” महाराज, आपके पास बहुत धान है, मैं केवल गरीबों के लिए चित्र बनाता हूं।यह सुनकर राजा को गुस्सा आ गया, और राजा ने आदेश देकर उस पेंसिल को कुशल से छीन ली। और वो खुद सोने के पैर का चित्र बनाने लगी, लेकिन उस चित्र के अनुसार वह सोने का पेड़ प्रकट नहीं हुआ।

फिर उसने प्रधानमंत्री को उस पेंसिल से पैर के चित्र बनाने कहां, लेकिन उस चित्र से भी कोई चीज प्रकट नहीं हो पाई। और राजा बहुत क्रोधित हो गया।

राजा ने कुशल को बोला,”सुना कुशल, जैसा मैं बोल रहा हूं तुम्हें वैसा ही करना पड़ेगा। वरना मैं तुम्हें बंदी बना दूंगा।” कुशल मन में ही सोचने लगा… अगर वह आदेश का पालन नहीं करेगा तो राजा उसे कारागार में बंद तो करेगा ही, लेकिन वह गरीब लोगों के लिए कुछ नहीं कर पाएगा।

वह चतुर था ही, वह पेंसिल उठाई और झट से उस बूढ़े आदमी का चित्र बनाया। और फिर वहां वह बूढ़े आदमी प्रकट हो गया। उसने राजा को समझाया,”प्रणाम महाराज! सच कहूं तो आपके पास पैसे की कोई कमी नहीं है। लेकिन वाकई जो गरीब है, कुशल उनके लिए ढेर सारी खुशियां लाने की काम कर रहा है। 

आपने उससे यह पेंसिल छीन ली, लेकिन यह अपने इच्छा अनुसार कोई भी काम नहीं कर पाई। और ना ही किसी के हाथ से कोई भी चित्र में जान नहीं आएगी। कुशल के काम के प्रति लगन और उसके इमानदारी देखकर ही उसे यह पेंसिल मिली है।”

राजा को अपनी गलती का एहसास हो गया। उन्होंने उस बूढ़े आदमी और कुशल से माफी मांगी। और फिर बूढ़ा आदमी वहां से गायब हो गया। राजा ने कुशल का सम्मान किया।

इससे यही सीख मिलती है, कि ईमानदारी और लगन से अपना काम करते रहना चाहिए। स्वार्थी होकर लोगों से छल करना बहुत गलत बात है।

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कृष्णा और सुदामा

बहुत समय पहले की बात है, कृष्णा और सुदामा एक ही गुरु के आश्रम में पढ़ते थे। वे दोनों पक्के मित्र थे। समय बीतता गया, कृष्णा द्वारका का राजा बन गए, परंतु सुदामा का जीवन गरीबी और कष्ट से भरा था।

एक दिन सुदामा के पत्नी ने उनसे कहा,”आप बहुत बार कह चुके हैं की द्वारका के राजा कृष्ण आपके मित्र हैं? आप उनके पास क्यों नहीं जाते? वह अवश्य आपको सहायता करेंगे।” सुदामा ने अपने पत्नी के बात मान ली।

वह कहां,” इतने दिनों के बाद मित्र कृष्णा से मिलूंगा। खाली हाथ कैसे जाऊंगा ! घर में तो कुछ है नहीं। क्या उपहार लेकर जाऊं! ” तब सुदामा के पत्नी पड़ोस से  थोड़ा सा चावल ले आए। और उनके पोटली बनाकर सुदामा को दे दी।

सुदामा घर से चल पड़े, उनका मन घबरा रहा था। वह सोच रहा था, कृष्णा बड़े राजा हो गए हैं, अगर उन्होंने ना पहचाना तो ! चलते चलते सुदामा द्वारका पहुंच गए।

कृष्णा के महल के द्वार पर जा खड़े हुए। लेकिन प्रहरी ने उनको रोकते हुए कहा,”आपको किससे मिलना है?”

सुदामा बोला,” मेरा नाम सुदामा है, मैं अपने मित्र कृष्णा से मिलने आया हूं।”

जैसे ही प्रहरी ने अंदर जाकर सुदामा का नाम लिया, कृष्णा दौर दौर बाहर आए। उन्होंने स्नेह से सुदामा को बाहों में भर लिया। फिर आदर से अंदर ले गए।

और पात्र मैं पानी लेकर स्वयं सुदामा के पा धोए। अपने साथ सिंहासन में बिठाया। फिर दोनों बचपन के बातें याद कर करके हंसने लगे।

कृष्णा हंसकर सुदामा से पूछा,” मित्र भाभी ने मेरे लिए कुछ उपहार नहीं भेजा?” सुदामा चावल के पोटली देने के लिए संकोच कर रहे थे। कृष्णा ने स्वयं हाथ बढ़ाकर पोटली ले ली।

उसी से लेकर दो मुखी चावल प्रेम से खाए। कुछ दिन राज महल में सुख से रहने के बाद सुदामा विदा हुए।

घर लौटते समय वह यह सोचने लगे, कृष्णा ने कुछ दिया तो है नहीं, घर में पत्नी पांच लगाकर बैठी होगी।

तो घर जाकर मैं क्या कहूंगा।

सुदामा जब अपने गांव पहुंचे, तो वहां कर चित्र देखकर शौकीन हो गए। जहां उनकी टूटी फूटी छोकरी थी, वहां आब महल खड़ा था। वहां का परिवेश बिल्कुल द्वारका के जैसा था। सुदामा सब समझ गए।

उसने कहा,” यह चमत्कार निश्चय कृष्णा ने किया है।

उन्होंने मित्रों का मान रख लिया। इसी तरह सुदामा तब से सुख के जिंदगी बिताने लगे। और उनकी दोस्ती अटूट रहे।

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असली मित्रता 

एक जंगल में एक चूहा, हिरन, कव्वा और कछुआ रहते थे। यह सब बहुत अच्छे मित्र थे। दिनभर कछुआ तालाब के किनारे रेत में धूप सेकता, और पानी में डुबकिया लगाता था। बाकी तीन मित्र जंगल में भोजन की तलाश में घूमते और दिन छुपते ही अपना घर लौटा आते।

शाम को चारों मिलकर खूब खेलते और धमाल मचाते। एक दिन शाम को चूहा और कौवा तो लौट आए परंतु हिरन नहीं लौटा। सब ने बहुत परेशान थे।

कछुआ भराय गले ने बोला,”वह तो हर रोज तुम दोनों से भी पहले लौट आता था, आज पता नहीं क्या बात हो गई? जो अब तक नहीं आया।”

कव्वे ने कहा,”सुबह होते ही मैं वहां पर और कर जाऊंगा, जहां हर रोज वह चढ़ने जाता है।” कछुए ने कहां,”मैं तो अभी उस और जा रहा हूं, क्योंकि मेरी चाल धीमी है। तुम दोनों सुबह आ जाना।”

चूहा बोला,”मैं भी कछुए भाई के साथ जा रहा हूं। कब है भाई तुम सुबह होते ही चल पड़ना।” यह कहकर चूहा और कछुआ चले गई।

कौवा सुबह होते ही उड़ चला, उड़ते उड़ते वह चारों ओर देख के जा रहा था, आगे एक स्थान पर उसे चूहा और कछुआ जाते हुए नजर आए। कव्वे ने का का करके उन दोनों को सूचना दी, के उन्हें देख लिया है, और वह हिरण के खोज में आगे जा रहा है।

उड़ते उड़ते अचानक कौवे की नजर हिरण पर पड़ी। जो कि शिकारी के जाल में फंसा छटपटा रहा था। कौवा उड़ते हुए उसके पास पहुंचा। हिरण ने रोते हुए बताया,

कि कैसे वह शिकारी के बिछाए हुए जाल में फस गया।

कौवा बोला,”मित्र तुम घबराओ नहीं! हम तुम्हें छुड़ा लेंगे। कव्वे ने पंख फड़फड़ा है और कहां, मैं मित्र चूहे को अपना पीठे मैं बिठाकर ले आता हूं, वह आपने दांतो से यह जाल कुतर देगा।

ऐसा कहते ही कौवा तेजी से उदा और वहां पहुंचा जहां कछुआ और चूहा आ पहुंचे चुके थे। कव्वे ने चूहे और कछुए को बताया, के मित्र हिरण एक शिकारी के जाल में फस गया है। और हमें उसे शिकारी के आने से पहले छुड़ाना होगा।

चूहे की तेज दिमाग में कौवे की इशारा समझ लिया। चूहा बोला, घबराओ नहीं कव्वे भाई, मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर, जल्दी से हिरन भाई के पास ले चलो।

उसके बाद वहां पहुंचते ही चूहे ने जाल को अपने दांतो से काटकर तहेस नहेस कर दिया, और हिरण को आजाद कर दिया। आजाद होते ही हिरण ने अपने मित्रों को गले लगा लिया। और उन्हें धन्यवाद दिया।

तभी कछुआ ने भी कहां पर आ पहुंचा। सभी बहुत खुश थे, कि तभी हिरण ने शिकारी को उस तरफ आते हुए देखा और बोला,” मित्रों तुरंत छुप जाओ। वह देखो शिकारी इस तरफ आ रहा है।”

चूहा फौरन ही पास के एक दिल में छुप गया, कौवा उड़ कर डेट के एक ऊंचे दाल में जा बैठा, हिरन एक ही छलांग में पास के एक झाड़ियों में छुप गया, परंतु धीमी गति के कछुए पर शिकारी की नजर गई।

और उसने कछुए को उठाकर थैले में रख दिया, यह देख कर हिरन ने लंगड़ा बंद कर शिकारी के आगे चलने लगा, हिरण को देखकर शिकारी ने हिरण को ही शिकार करने को सोचा।

और वह ठेला पटक कर हिरण के पीछे दौड़ पड़ा, हिरण उसे लंगड़ा ने का नाटककार उसे घने जंगल में ले गया और फिर रफूचक्कर हो गया। शिकारी बहुत हैरान हो गया।

तब वह कछुए से ही काम चलाने के लिए वापस लौटा तो देखा, वह थैला खाली पड़ा है। शिकारी मुंह लटका कर खाली हाथ वापस लौट गया।

यह कहानी से हमें यह सीख मिलता है की सच्चे मित्र हो तो, कोई भी मुसीबत का सामना किया जा सकता है।

END

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